
कुछ दिल पहले मैंने एक लेख लिखा। वह लेख http://jasvirsaurana.blogspot.com/2008/09/blog-post_11.html ये कैसे पति............ है। मैंने लेख में वही लिखा जो मेरे सामने हुआ। उस पर मुझे किसी ने के टिपणी की और उन्होंने मेरी सोच को भी ग़लत बताया। वह टिपणी इस तरह की थी.............
Anonymous said...एक औरत जो अपनी पूरी जिन्दगी अपने पति को दे देती है। फ़िर भी उसके साथ ऐसा क्यों होता है................ न उसे सम्मान मिलता है और ना ही उसे चैन से दो वक्त कि रोटी।
यही समस्या है जब कोई औरत इस तरह अपनी क्षमताएं खोकर खुद को निरीह और लाचार बना लेती है तो पति के लिए बस वह एक रखैल की तरह हो जाती है आखिर वेश्या और ऐसी पत्नियों में क्या अंतर जो दो वक्त की रोटी के लिए पतियों की सारी बातें सहती रहती है, इससे अच्छी तो वेश्याएं होती हैं जो अपनी मर्जी से कूछ कर तो पाती है,इसलिए दिक्कत आप जैसी सोचवाली पत्नियों की हैं जो दो वक्त की रोटी के लिए पति के पावों पर पडी रहती हैं,औरत को अपना वजूद खुद खडा करना पडेगा किसी का पति इससे ज्यादा नहीं चाहेगा कि उसकी पत्नी बिना पैसे की रखैल की तरह उसकी गुलाम बनी रहे
एक बात मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैंने कुछ ग़लत सहन नहीं किया है। जो भी मेरे सामने आया मैं उससे लड़ी हूँ। जहाँ तक मैंने देखा है तो यही पाया है कि हर इन्सान को संघर्ष करना पड़ता है कुछ न कुछ पाने के लिए। मैं भी आज जहाँ हूँ वहाँ ऐसे नहीं पहुँची हूँ। दुनिया से लड़ी हूँ इसलिए आज हर प्रकार से खुश हूँ।
एक औरत अपने प्रेम के आगे थोड़ी लाचार हो जाती है। इसका अर्थ कतई ये नहीं कि वो उन छिछोरे मर्दो का सामना नहीं कर सकती। वह चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है लेकिन अपने पति व अपने परिवार से अत्यधिक प्रेम करने वाली औरते ख़ुद लाख जतन सहने के बाद भी अपने परिवार और पति को दुःख नहीं देना चाहती है तो क्या ये औरत की कमजोरी है। और जहाँ तक रोटी का सवाल है तो एक औरत चाहे तो दुनिया भर के रुपये पैसे अपने कदमों में ला सकती है। एक औरत नम्र होती है इसलिए अपने परिवार को बांधे रखती है। सिर्फ़ अपने बारे में नहीं सोचती और जो परिवार के लिए सही है वही करती है। पर आप उन मर्दो को कुछ क्यों नहीं कहते जो इस तरह के काम करते है। कोई शराब पीकर बीबी को मारता है, कोई अपनी पत्नी को धोखा देकर दूसरी औरतों से सम्बन्ध रखते है और बदले में अपनी पत्नी से निश्छल प्रेम कि कामना करते है। और कई मर्द तो इससे नीचे भी गिर जाते है। ऐसी बातें हम अकसर न्यूज़ में सुनते ही रहते है। ये तो कोई बात नहीं हुई। एक मर्द न जाने क्यों हर समय औरत को ही ग़लत ठहरता है। अगर वो उससे लड़ती है तो भी वह इस समाज में ग़लत ही कहलाई जाती है और अगर न लड़े तो आप जैसे लोग उसे ग़लत कह देते है। सूरत परेशानी की चाहे जो भी हो पर ग़लत सिर्फ़ औरत ही। आख़िर क्यों??????????
मेरी नम्रता
न जाने क्यों
तुझे रास नहीं आती
मेरी कठोरता
न जाने क्यों
तुझे रास नहीं आती
अगर में रोती हूँ
तो मैं कमजोर हूँ।
अगर में लड़ती हूँ
तो मैं बेईमान हूँ।
क्यों तू मुझे लज्जित करता है
हर कदम पे।
क्यों तू भूल जाता है
जिसके वजूद पर खड़ा है
उसी पर उंगली उठाता है......................




19 comments:
बहुत खूब ....
रश्मि जी! सबसे पहले तो आपको कहूँगा की आप अपने कोम्मेट्स Anonymous हटा दें, जिससे की वो लोग जिनकी ब्लॉग जगत में पहचान नहीं है, कुछ भी उल्टा सीधा न कह पायें.. मुझे उस टिप्प्न्नी को पढ़कर इतना गुस्सा आ रहा है, लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उसकी पहचान नहीं है...
उसने वैश्या की बात की एक वैश्या किस हालत में आकार ऐसा कदम उठती है यह वो ही जानती है!
वाश्याओं पर ऊँगली उठाने वाले एक बार जाकर तो देखें की वो कैसे अपना जीवन जीती हैं, लेकिन वो वहां जाते हैं केवल अपनी हवस मिटाने...
खैर आपकी ये पोस्ट पढ़कर मन और भी ज्यादा विचलित हो गया है.. लेकिन अफ़सोस हम कुछ नहीं कर सकते...
आपसे गुजारिश है की Anonymous हटा दें...और आपके इस लेख को सेल्यूट है...
वैसे एक बात कहूँ रश्मि जी, उस टिप्पणी देने वालेकी इस तरह की बातों से पता चलता है की देश में कितनी गंदगी भरी है...
जारी रहे....
एक और बात में चाहूँगा की उस टिप्पणीदाता को वैसी ही पत्नी मिले, जैसा उन्होंने टिप्पणी में जिक्र किया है...
रश्मि जी, मीत जी। इस अनाम टिप्पणी से परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। जिस किसी ने भी की है उस ने भले ही हद से आगे जा कर कड़वे शब्दों का प्रयोग किया है। लेकिन जो बयान किया है वह एक सचाई भी है। किसी समय प्रख्यात कथाकार यशपाल ने कहा था "एक औरत वैश्या हो कर ही स्वतंत्र होती है"
इस तरह के विचार सामने आते रहेंगे। टिप्पणीकर्ता ने इन शब्दों को व्यवहार में मिथ्या सिद्ध करने की चुनौती दी है। वह बुरी नहीं है।
क्यूँ परेशान हो रहे हैं??
आपने सही कहा..सही तरीके से अपनी बात कही..बस्स!! इत्मिनान से रहें. लिखते रहे नियमित.
रश्मि जी मैंने आपके दोनों लेख पढ़े है. सच बोलू तो इस टिपणी दाता ने ये बता दिया की ये अपनी पत्नी को वेश्या समझाता है. तभी तो उसने ऐसा लिखा है. ऐसे आदमी आख़िर अपनी औकाद बता ही देते हैं. आपके पहले वाला लेख बहुत ही बढ़िया था और ये वाले लेख का तो कोई जवाब ही नहीं है. सही तमाचा मारा है टिपणी दाता के मुहँ पर. पर आपने जो लिखा वो बिल्कुल सच है. तभी तो हमारे देश के अधिकतर परिवार हमेशा साथ रहते है. और यही हमारे भारत देश का गहना है. और हा अगर टिपणी दाता में हिम्मत है तो अपने ब्लॉग से टिपणी क्यों नही करता. हमेशा अभद्र टिपणी करने वाला अपनी पहचान नही बताता है. इसका मतलब यही है की वो जो कह रहा है ग़लत कह रहा है. मीत जी बिल्कुल ठीक कह रहे है कि देश में कितनी गंदगी भरी है. आप सिर्फ़ अपना काम करिए कुत्ते तो भौकते रहते हैं. आप बहुत अच्छा लिखती है. लिखती रहे.
आप लिखे ..वही अच्छा है ...सब पढ़ते हैं बात समझते हैं ..
मैं आदरेय द्विवेदी जी से सहमत हूं.
आप किसी भी प्रकार से विचलित ना हों.
जारी रखें...
हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं..
आप अपना पक्ष रखें और मजबूती से रखें। दुनिया में स्त्रियॉं अलग-अलग परिस्थितियों में जीती हैं और सबके अनुभव में मौलिक अंतर नहीं होता मगर वे सार्वभौम भी नहीं होते।
( बेनामी में जो कहा गया, वह उनका पक्ष है, उससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है।)
अनाम टिप्पणियों की सुविधा न देना ही अच्छा है. लेकिन जैसा द्विवेदी जी ने कहा, अनाम की टिप्पणी से विचलित होने की जरूरत नहीं है.
कई बार कडुवी बात को शांति से देख कर उसका बडा संतुलित जवाब दिया जाये तो बहुत अच्छा असर होता है, जो आप ने इस आलेख की सहायता से प्रमाणित कर दिया है.
लेखनी को चलते रहने दीजिये!!
-- शास्त्री
-- ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने अपने विकास के लिये अन्य लोगों की मदद न पाई हो, अत: कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर अन्य चिट्ठाकारों को जरूर प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)
आखिर वेश्या और ऐसी पत्नियों में क्या अंतर जो दो वक्त की रोटी के लिए पतियों की सारी बातें सहती रहती है???
अंतर यही है कि पत्नी अगर अपने पति की सारी बातें सह लेती है तो युग-युगांतर में रामायण के सीता की तरह पूज्य हो जाती है और अगर नहीं सहती है फिर भी महाभारत के पांचाली के समान प्रेरणा बन जाती है....अतः एक पत्नी की तुलना ऐसे नही हो सकती जैसा इस प्रश्न में किया गया है.
फिर भी जो कमेन्ट था उसपर हमें इतनी आपत्ति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसका जवाब नहीं देने से उस व्यक्ति के मन में सवाल रह ही जायेंगे और समाज के मन में भी जिसने ये कमेन्ट आपके ब्लॉग पर देख लिया होगा. इसीलिए आपने सही किया कि उस कमेन्ट का जवाब दिया !!
aap pareshan n ho, aisi baton ko shajta se lena shuru karen, waise aapki baaton ne kafi kuch sochne par majbur kiya hai.
पहले तो आपने बहुत अच्छा किया जो आपने उसकी टिप्पणी का जवाब सार्वजनिक रूप से दिया। दूसरा जो लोग ऐसी टिप्पणी करते हैं, असल में वो हमारे शिक्षक हैं, जो हमें अच्छा लिखने की प्रेरणा देते हैं। क्योंकि ये हमारा समाज है और यहां हर प्रकार के लोग हैं, ज़रूरत है इनकी मानसिकता जानकर ख़ुद को सही रखने की। उस शख्स की बातों का गहराई से अध्ययन करें। कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलेगी। बाकी बात ये है कि अगर वो खुलकर सामने आ जाए, तो वो भी जानता है कि उसका क्या बनेगा? हाथी की तरह मदमस्त होकर चलें। ये छोटे-मोटे ------- तो अगल-बगल मंडराते ही रहेंगे।
पराशर जी की कविता बड़ी ही मार्मिक है। प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद।
कुछ लोग लाइलाज होते हैं.
रश्मि जी कुछ लोग ऐसे ही होते है कुत्ते की पूछ की तरह....... वैसे मुझे लगा की जो ये टिपणी दाता है कहीं न कहीं आपके पहले वाले लेख जैसा ही होगा तभी तो उसने ऐसी टिपणी की है. हो सकता है वो वेश्याओं के पास जाता होगा तभी वेश्याओं की इतनी तारीफ कर रहा है.
आप बहुत सुंदर लिखती है. आपके लेख सच्ची बात कह जाते है. और सच तो कड़वा ही होता है. पर मैं आपसे इतना ही कहना चाहुगा की आप सच के साथ है और सच हमेशा जीतता है. तभी तो कहते है सत्य मेव जयते......
आदरणीय, जसवीर और रश्मि जी,
मै अक्सर आपका ब्लॉग पड़ता हू,आपकी भाषा बहुत सरल और दिल को छु लेने वाली होती है,उन ना समझ आने वाले कवियों से तो. खैर आपका लेख पढ़ा बहुत सच और अच्छा लिखा है .और उस घटिया टिपण्णी को भी,बहुत सही जबाव लिखा हे आपने,मै तो उन महान व्यक्ति के बारे मै सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगा की ऐसा व्यक्ति उसी तबके से सम्बन्ध रखता होगा जो उसने टिप्पणी मै लिखा है,कहीं न कहीं उसकी माँ या बहन इससे सम्बंधित हो सकती हे,या ये व्यक्ति कुंठित हो सकता हे ,या मानसिक रूप से बीमार,कहीं न कहीं कुछ तो है.जो व्यक्ति भारतीय नारियों को इस जगह रखता हो ,निंदनीय है,सर्वथा निंदनीय. आपका प्रयाश श्रेष्ठ है,,,,,,,,ब्लॉग जगत में आपका स्थान और उंचा हो गया है.आशा है जल्द ही आपको पत्रिकाओ में पढने का मौका मिलेगा.
Bas bas vakeel sahiba dheeranjan se kaam leven. Kya vo ek Teep in 18 teepon se badee hai. Udantashtari dineshjee ke saath.
-Aapka apna
क्यों तू मुझे लज्जित करता है
हर कदम पे।
क्यों तू भूल जाता है
जिसके वजूद पर खड़ा है
उसी पर उंगली उठाता है......................
wah
bahut sateek kaha
ek kavi ne ..aadarniya harish bhadani sahab ne apne geet mein barso pahile jo lkikhawah yaadaaya
ese mat chedd ye pasar jayegi
ret hai ye ret bifar jayegi
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