तेरी आवाज ढूढता हूँ, हर गम में खुशी का अहसास ढूढता हूँ।
माना तू बहुत दूर है मेरी पहुचँ से,
फ़िर भी तुझे मेरे आसपास ढूढता हूँ।
बीच राह पर मिलने पर,
क्या कहा कर पुकारू,
अपनी गजलों में वही अल्फाज ढूढता हूँ।
पल पल जिन्दगी फिसल रही है रेत सी हाथ से,
हर पल में तेरे साथ बीते लम्हें ढूढता हूँ।
जानता हूँ नहीं है मेरे मुक़द्दर में तू,
पर अपने हाथों की लकीरों में बदहवास ढूढता हूँ।
महसूस करता हूँ अकेला हूँ,
एक बड़े शहर की राहों पर,
खामोश शहर खामोश गलियों में,
तेरी आवाज ढूढता हूँ।
याद है मुझको आज तक,
तेरा सिमटकर बाँहों में आना,
सर्द हवा की सिरहन में तेरा अंदाज ढूढता हूँ।




15 comments:
याद है मुझको आज तक,
तेरा सिमटकर बाँहों में आना,
सर्द हवा की सिरहन में तेरा अंदाज ढूढता हूँ।
bahut achcha...
touch my heart...also
जानता हूँ नहीं है मेरे मुक़द्दर में तू,
पर अपने हाथों की लकीरों में बदहवास ढूढता हूँ।
सच मे कहरहे हो भाई,आप का धन्यवाद
याद है मुझको आज तक,
तेरा सिमटकर बाँहों में आना,
सर्द हवा की सिरहन में तेरा अंदाज ढूढता हूँ।
--वाह वाह!! क्या बात है..बहुत खूब!
very touching loving n admirable poetry. Liked as a whole han.
प्रभावशाली॥
सिरहन नही सिहरन , अच्छा प्रयास है आपका
वाह जी अच्छा प्रयास
अच्छी है यह रचना आपकी
badiya hai
अच्छी रचना
bahut khoob dost
जानता हूँ नहीं है मेरे मुक़द्दर में तू,
पर अपने हाथों की लकीरों में बदहवास ढूढता हूँ।
bahut sunday rachna hai. badhai ho
main aapki baton se sahmat hoon rashmi ji.. lekin usi din maine TV pr ek aisi ghatna dekhi jisse mera mann ashant hai..
us din ek ladke ke sine se ek lohe ki rod par ho gayee thi par bhagwan ne use bacha liya.. mujhe khushi huyee ki ye chamtakr hua or mann main vishvas bhi jaga ki jiske liye main prarthna kar raha hoon wo bhi thik ho jayengi par..
agar ek or chamtkar ho jata to kya galat tha..
बहुत खूब। सच में जिन्दगी किसके रोके रूकी है। हम चाहे लाख कोशिश कर लें, पर वह मुटठी में बंद रेत की तरह फिसलती ही जाती है।
महसूस करता हूँ अकेला हूँ,
एक बड़े शहर की राहों पर,
खामोश शहर खामोश गलियों में,
तेरी आवाज ढूढता हूँ।
Beautiful rendition of thoughts. Your thoughts represent common man of india. Keep it up.
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