Monday, August 4, 2008

रिश्तों को हारकर अब क्या जी पाऊँगी मैं................

बरसों पहले साथ छोड़ा था अपनों ने,
तब खून से सींचा था तुझे,
आरजुओं को दफ़न करके सीने में,
तुझे तकलीफों से बचाया था मैंने।
मन के तूफान को,
रोक के रखा था आज तक।
सोचा था एक वक्त मेरा भी आएगा,
मेरा लाल मेरी आरजुओं को,
फ़िर से जगायेगा।
मेरी आँखों को,
फ़िर से सपने दिखायेगा।
पर न मालूम था,
इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
रिश्तों को हारकर अब क्या जी पाऊँगी मैं।

14 comments:

मीत said...

रश्मि जी...आपकी इस रचना ने दिल चीर दिया...बहुत अच्छी है ये इसकी तारीफ के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं
लिखती रहें...

रज़िया "राज़" said...

वाह ! जिवन की क्या सच्चाइ लिख़दी है आपने?

रंजू भाटिया said...

इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
बहुत सुंदर लिखा है आपने ..यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आई

Shikha Singh said...

bhut sundar or marmik rachana kar di hai. badhai ho.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर भाव, धन्यवाद

मीत said...

Rshmi ji aisi rachnayein kabhi kabhi hi banti hain...
subah se ise kai bar padh chuka hoon..
bahut kam shbdon main ek maa ka hale-e-dil bayan kar diya apne jee chahta hai ki bar bar padh kar comments deta rahu..
its ur best...
keep it up..
sach mein mere pas word nahin hain iske liye...

डाॅ रामजी गिरि said...

*अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
रिश्तों को हारकर अब क्या जी पाऊँगी मैं। *

रिश्तों के संक्रमण काल में संघर्ष की व्यथा का बेहतरीन चित्रण ...

Udan Tashtari said...

वाह, क्या बात है..बहुत सुन्दर-भावपूर्ण.

डॉ .अनुराग said...

jevan ka sach hai..jitni jaldi samjhe..utna achha...

Hari Joshi said...

बिखरी हुए पन्नों यानी जिंदगी को समेटन का संघर्ष ही तो जीवन है। फिर पलायन या पलायनवादी सोच क्यों?

admin said...

जीवन के रंगों को उकेरती कविता है, बधाई।

Vinaykant Joshi said...

इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
bahut acchi abhivyakti
dhanyavaad

कुमार मुकुल said...

अच्‍छी है कविता

Rahul Singh said...

कविता पर विचारों का बोझ महसूस हुआ इसलिए कथन है कि समय तो करवट लेता है, लेगा भी.