बरसों पहले साथ छोड़ा था अपनों ने,तब खून से सींचा था तुझे,
आरजुओं को दफ़न करके सीने में,
तुझे तकलीफों से बचाया था मैंने।
मन के तूफान को,
रोक के रखा था आज तक।
सोचा था एक वक्त मेरा भी आएगा,
मेरा लाल मेरी आरजुओं को,
फ़िर से जगायेगा।
मेरी आँखों को,
फ़िर से सपने दिखायेगा।
पर न मालूम था,
इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
रिश्तों को हारकर अब क्या जी पाऊँगी मैं।




14 comments:
रश्मि जी...आपकी इस रचना ने दिल चीर दिया...बहुत अच्छी है ये इसकी तारीफ के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं
लिखती रहें...
वाह ! जिवन की क्या सच्चाइ लिख़दी है आपने?
इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
बहुत सुंदर लिखा है आपने ..यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आई
bhut sundar or marmik rachana kar di hai. badhai ho.
बहुत सुन्दर भाव, धन्यवाद
Rshmi ji aisi rachnayein kabhi kabhi hi banti hain...
subah se ise kai bar padh chuka hoon..
bahut kam shbdon main ek maa ka hale-e-dil bayan kar diya apne jee chahta hai ki bar bar padh kar comments deta rahu..
its ur best...
keep it up..
sach mein mere pas word nahin hain iske liye...
*अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
रिश्तों को हारकर अब क्या जी पाऊँगी मैं। *
रिश्तों के संक्रमण काल में संघर्ष की व्यथा का बेहतरीन चित्रण ...
वाह, क्या बात है..बहुत सुन्दर-भावपूर्ण.
jevan ka sach hai..jitni jaldi samjhe..utna achha...
बिखरी हुए पन्नों यानी जिंदगी को समेटन का संघर्ष ही तो जीवन है। फिर पलायन या पलायनवादी सोच क्यों?
जीवन के रंगों को उकेरती कविता है, बधाई।
इतिहास अपने आपको दोहराएगा।
अपनों का साथ फ़िर से छूट जाएगा।
अब फ़िर बिखरी हुई जिन्दगी को,
समेट न पाऊँगी मैं।
bahut acchi abhivyakti
dhanyavaad
अच्छी है कविता
कविता पर विचारों का बोझ महसूस हुआ इसलिए कथन है कि समय तो करवट लेता है, लेगा भी.
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