तस्सवुर में एक परछाई आती है, कभी मेरे होठों को,
कभी मेरे गालों को,
चूम जाती है।
कभी मन की गहराइयों में,
खो जाती है।
कभी एक साया सा,
लहरा जाती है।
कभी अपने निशां को,
मेरी रूह में छोड़ जाती है।
रोज कहती हूँ,
परछाई तो दिखा जाती है,
पर तेरी खुशबू
जो मेरी सांसों में बस जाती है,
उसी से एक आस बन जाती है
कि
परछाई तो
कभी ना कभी रूबरू हो ही जाती है।




15 comments:
im here because of few cents for you. just dropping by.
परछाई तो
कभी ना कभी रूबरू हो ही जाती है।
bahut badhiya...
kaise itna acha likh leti hain aap?
bahut acha laga.. padhkar..
lekin pichli kavita to lazawab thi..
likhti rahen...
sunder rachna se prichay karane ke liye shukriya..
bahut badhiya.....
खूबसूरत!!!सिर्फ़ इतना ही कहूँगा..
और हा आपकी ब्लॉग पर गाना भी अच्छा लगाया है आपने
बहुत उम्दा, बहुत बढिया.लिखते रहें.
आपके ब्लाग पर रचनाओं की एक सुन्दर लहर बहती है।
''कभी मन की गहराइयों मेंए
खो जाती है।
कभी एक साया साए
लहरा जाती है।''
बहुत अच्छी रचना।
धन्यवाद.
kya baat hai Rashmiji. bhut sundar rachana.
vakai aapki rachanao ki jitani tarif ki jaye utani kam hai. likhti rhe.
Rashmi ji, bhut sundar likhti hai. badhai ho.
कभी अपने निशां को,
मेरी रूह में छोड़ जाती है।
" bhut pyaree nazuk see poetry,liked it"
Regards
कभी अपने निशां को,
मेरी रूह में छोड़ जाती है।
दिल की गहराई से निकले हुए शब्द हैं। सीधे दिल तक पहुंचते हैं।
वाह अच्छी कविता है
अद्भुत संवेदनाऒं का संगम..
aapko badhaiii.........
अद्भुत संवेदनाऒं का संगम..
aapko badhaiii.........
sundar samagam hai dilodimag ka bahot badhiya .......
badhai........
regards
Arsh
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