Monday, August 18, 2008

बैचेनी का आलम...................


बैचेन तो तब भी थी,
जब तुम साथ थे।
बैचेन तो आज भी हूँ,
जब तुम साथ नहीं।
उस बैचेनी का आलम,
मेरा दीवानापन था।
और
इस बैचेनी का आलम,
मेरा वीरानापन है।

10 comments:

Rajesh Roshan said...

उम्दा रचना

कुश said...

brilliant ... bahut hi khoobsurat

admin said...

बेचैनी किसी भी चीज की हो, वह आदमी को किसी काम नहीं छोडती।

मीत said...

aisa lagta hai ki mera hal-e-dil kah diya...
acha hai..

Unknown said...

रश्मि जी इतने कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी आपने. बहुत ही सुंदर व गहरी बात.

Shikha Singh said...

Rashmi hi bhut badhiya likha hai. badhai ho.

बालकिशन said...

बेहतरीन!
अति सुंदर!
पढ़कर अच्छा लगा.

Udan Tashtari said...

सुंदर व गहरी अभिव्यक्ति है ...

seema gupta said...

उस बैचेनी का आलम,
मेरा दीवानापन था।
और
इस बैचेनी का आलम,
मेरा वीरानापन है।
" bhut khubsuret"

ज़ाकिर हुसैन said...

उस बैचेनी का आलम,
मेरा दीवानापन था।
और
इस बैचेनी का आलम,
मेरा वीरानापन है।

बहुत शानदार
लिखती रहिये