एक अतिशिक्षित एवं बेरोजगार व्यक्ति की मनोभावना, कश्मोकश क्या होती है, ये मुझसे बेहतर कौन जान सकता है। मैने अपने केरियर के शुरुआत में जो सब कुछ महसूस किया वो शायद आपने भी महसूस किया होगा। हालांकि अब भी मैं अपने केरियर के शुरूआती दौर में हूँ मगर ये दौर उस दौर से काफी अलग है।
बात तबकी है जब मैं विधि प्रथम वर्ष का छात्र था। तब मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। हालांकि तब तक मैने अपने केरियर का कोई मापदंड स्थापित नहीं किया था। जब मुझे अपनी सहपाठिनी से प्यार का अहसास हुआ [जो अब मेरी पत्नी है] तभी अचानक मुझे अपनी जिम्मेदारी का भी अहसास हुआ, तभी मुझे "बेरोजगारी" का सही अर्थ भी पता चला। मेरे बड़े भाई साहब जिन्होनें मुझे दिल्ली जाकर फोरेन लेंगवेज पढने का ओप्शन दिया। मगर मेरे पापा ने मना कर दिया क्योंकि वो मुझे सरकारी नौकरी में देखना चाहते थे। और मेरा भी कोई मन नही था अपने घर से बाहर जाने का। सो मैने भी मना कर दिया, पर कहते है कि विधाता ने सबके लिए कुछ न कुछ सोच रखा होता है। उन्हीं दिनों अचानक मेरा सलेक्सन बी एड में हो गया। और मैं आगरा जाने कि तैयारी करने लगा। उद्देश सिर्फ़ एक नौकरी लगना ताकि मैं अपने मम्मी पापा के सपने पूरे करना और अपनी प्रेमिका से शादी करनी थी। जब अगले दिन मैं कोलेज गया तो रशी ने कहा कि तुम बी एड करने मत जाओ, करना है तो कुछ और करो। और जब उसने बी एड करने के लिए मना किया तो मैं आगरा नही जा सका। मैं अगस्त 2005 में दिल्ली आ गया और फ्रेंच पढ़ने लगा। घर से खर्च के लिए पैसे मिलते थे। मुझे ये सब अच्छा नही लगता था पर मैं क्या करता, मुझे पढ़ना था, ताकि मैं अपने सारे सपने पूरे कर सकू। ऐसे ही एक साल निकल गया। फ़िर मैने सोचा कि अब चाहे कुछ भी हो अब मैं घर से पैसे नहीं लूँगा। सो मैने एक कॉल सेंटर में 1 अगस्त 2006 में नौकरी कर ली। तब मुझे 4800 रूपये मिलते थे। खर्चा तो जैसे तैसे पुरा हो जाता था पर मुझे उस काम से संतुष्टि नहीं मिली क्योंकी जो सपने मैने देखे है वो ऐसे तो पूरे नही हो सकते थे। तीन महीने बाद मैने वो नौकरी छोड़ दी क्योंकी मेरे पेपर आने वाले थे। दिसम्बर में पेपर हो गए, फ़िर रिजल्ट भी आ गया। और 2007 भी। लेकिन मन अभी भी कुंठित था। तब मेरा एक दोस्त ने मुझे कहा कि तु गाइडिंग क्यो नही करते। यही काम मैं करना चाहता था। 10 फ़रवरी 2007 को मैने अपना पहला काम किया। ऐसे ही समय निकल गया, अब मैं महीने के पचास हजार रुपये कमाता हूँ। और मैं अब अच्छी और बड़ी कम्पनी मैं कार्यरत हूँ।
मेरे इस बात के कहने का मतलब यही कि यदि आदमी चाहे तो कुछ भी कर सकता है परन्तु उसे एक सही दिशा, मेहनत, लगन व लक्ष्य की जरुरत होती है। अगर ये सब किसी व्यक्ति के पास है तो वह निश्चित रूप से सफलता हासिल कर सकेगा।
Sunday, June 8, 2008
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1 comment:
आपका यह जज़्बा प्रेरणादायक है. बिल्कुल सहमत हूँ आपसे.
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