धूप हूँ, साया-ऐ-दीदार से डर जाता हूँ, तुझसे मिलता हूँ, तो कुछ और बिखर जाता हूँ।
सहिलों पर आवाज न देना कोई,
आग जिस ओर लगी हो, मैं उधर जाता हूँ।
तू नही है तो ख्यालों के अजब मौसम है,
जाने किस सोच में चलता हूँ ठहर जाता हूँ।
आसमां-रंग समंदर है तआकुब में मेरे,
प्यास लगती है तो सहर में उतर जाता हूँ।
रूह जलती है बहुत, जिस्म पिघलता है बहुत,
और मैं सहर के जंगल से गुजर जाता हूँ।
किसकी आँखों ने अक्स पहन रखे हैं,
ख़ुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हूँ।




3 comments:
किसकी आँखों ने अक्स पहन रखे हैं,
ख़ुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हूँ।
bahut hi achhi gazal,ye sher khas pasand aaya
रूह जलती है बहुत, जिस्म पिघलता है बहुत,
और मैं सहर के जंगल से गुजर जाता हूँ।
-वाह! बहुत बढ़िया.
वाह जसवीर जी अच्छी शायरी करते हैं आप तो
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