मैं हैरान हूँ, कि हुआ क्या है मुझे।
लगता है कुछ बदलाव सा है,
इस ठहरी हुई जिंदगी में,
कुछ उतार सा है।
लगता है ऐसे,
कि जैसे दबे पाँव कोई चला आता है,
मेरी पलकों को छूने,
आँख खोलू तो जाने किधर जाता है।
तुझे देखने की चाह,
मेरे अन्दर बढ़ती ही जाती है।
तू कभी बरसात में खिली,
धूप की तरह लगता है।
तू कभी ठंडी ओस बन जाता है।
तेरे तरुण प्यार के सागर में,
बह जाने को दिल चाहता है।
हर लहर से तेरा पता पूछती हूँ,
पर तू तो
ख़ुद ही लहर बन जाता है।
तुझको पाने की चाह,
बढ़ती ही जाती है।
लगता है तू यही है,
पर न जाने क्यों तरसाता है।
तेरे नयनों में,
डूब जाने को दिल चाहता है।
तू तो मेरा है,
फ़िर क्यों बना है अनजाना।
तेरी सांसों से सांसे,
जोड़ने को दिल चाहता है।
पर
मैं हैरान हूँ!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!




11 comments:
बहुत अच्छी रचना पढ़ने को मिली
लिखते रहिये
कभी बरसात में खिली,
धूप की तरह लगता है।
तू कभी ठंडी ओस बन जाता है।
तेरे तरुण प्यार के सागर में,
बह जाने को दिल चाहता है।
bahut hi sundar badhai
आपकी दिल को छूती पढने को मिली। मैं वास्तव में हैरान हूं कि इतने अच्छे रचनाकार से अब तक हमारी मुलाकात क्यों नहीं हुई?
तू कभी बरसात में खिली,
धूप की तरह लगता है।
सुन्दर अति सुन्दर। दिल खुश हो गया पढकर।
तेरी सांसों से सांसे,
जोड़ने को दिल चाहता है।
पर
मैं हैरान हूँ!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
--क्या बात है!! वाह!
m not gud in hindi typin so i'l prefer to rite in eng..
but it really seems odd though..
nice poem..
waah vakeel sahiba.ab yakeen ho gaya ki vakeelon ke bhee kathor hriday se bhee kavya kee dhara bahtee hai.dhanyavad.
बहुत खूब !
bahut sundar kavta ha, sath h niche maa wali kavita bhi achhi lagi,apnne mere blog par comment lkha ,mujhe waha se aapka blog address mila ,aur dil k lehron ko choo lene wali kavita padne me anand aaya
sundar hai....
bahut achcha likha hai Rashmi ji.
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